नई शिक्षा नीति ---- धरातल पर क्या ?- समझाविश बाबू
नयी शिक्षा नीति में मानव संसाधन मंत्रालय का नाम शिक्षा मंत्रालय रखने का निर्णय लिया गया स्कूलों में १०+२ फॉर्मेट के स्थान पर 5+३+३+४ फॉर्मेट को शामिल किया जायेगा ,ये व्यापक सुधार करने के प्रयास किये जा रहे हैं किन्तु जो नई शिक्षा नीति लायी जा रही है और जो लगातार इसमे सुधार के प्रयास किया जाता रहा है ,उसमे जो सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है उस पर ध्यान कम दिया गया । नीतिओं का कितना अमल धरातल पर होता है ,उसका क्या प्रभाव पड़ रहा है ,ये जानना जरुरी है। हमारे देश के भविष्य जो बच्चे हैं उनकी पढ़ाई सरकारी स्कूलों में ऐसी होनी चाहिए कि बाद में उन्हे या उनके अभिभावक को ये मलाल न रह जाये कि काश हमने भी अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में शिक्षा दिलाई होती। क्या कारण है कि सरकारी स्कूलों के शिक्षकों से आधे या उससे कम वेतन पाने वाले प्राइवेट शिक्षक इतनी तन्मयता से पढ़ाते हैं कि वो ज्यादा होशियार निकलता है। सरकारी स्कूलों में पोस्टिंग के जुगाड़ में ही समय जाया करते रहते हैं,कई स्कूल ऐसे पाएंगे जहाँ कम बच्चों पर अधिक शिक्षक नियुक्त पाएंगे। स्कूल में बच्चों कि उपस्थिति अधिकांशतः आधे से भी कम रहेगी ,५-६-७ के बच्चे पहाड़ा बताने कि स्थित में नहीं रहते। इसको छोड़ भी दें तो कई बार तो हास्यास्पद स्थित उत्पन्न हो जाती है कि साधारण सामान्य ज्ञान के प्रश्न कि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री तक के नाम नहीं बता पाते हैं। जो अधिकारी इससे जुड़े हैं वो भी इस पर विशेष ध्यान नहीं देते हैं ,खंड शिक्षा अधिकारीयों कि नियुक्ति ब्लॉक लेवल पर होती है। ये अगर प्रतिदिन ३-४ विद्यालय का ही निरिक्षण ढंग से करें ,क्लास में जाकर बच्चों से प्रश्न उनके स्तर का पूछें और शिक्षक को ताकीद करे तो गुड़वत्ता सुधर सकती है ,इसी तरह बेसिक शिक्षा अधिकारी को भी करना चाहिए। सच पूछिए तो प्रतयेक माह हर शिक्षक,खंड शिक्षा अधिकारी, बेसिक शिक्षा अधिकारी का सही-सही रिपोर्ट कार्ड बनना चाहिए ,जिसे क्रॉस चेक भी करते रहें तो कुछ गुडवत्ता पूर्ण सुधार हो। इसके अतरिक्त सरकारी स्कूलों में बच्चों के खेलों के साज-सामान और समाचारों से अवगत होने के संसाधन मुहैया होना चाहिए।
यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि जो इण्टर और डिग्री कॉलेजों कि भरमार होती जा रही है ये केवल डिग्री बाटने के संस्था मात्रा बन कर न रह जाएँ ,साथ ही शिक्षा माफिया शिक्षा पर इतने न हॉबी हो जाएँ कि हमारे युवा अवसाद के शिकार हो जाएँ। क्यूंकि जो भी भर्तियां निकलती हैं लगभग सभी विवादों और संदेह के घेरे में आ जाती हैं ,मेरे समझ में आजतक ये नहीं आया कि फर्जी डिग्रीयों के आधार पर कैसे शिक्षक बन जाते हैं कैसे सत्यापन होता है ,ये यह प्रदर्शित करता है कि कहीं न कहीं विभाग कि घोर लापरवाही है। क्यों न शिक्षा विभाग में और जरुरत पड़े तो सभी विभाग में एक अभियान के तहत डिग्रीयां सत्यापित कराई जाये और फर्जी लोगों को न केवल निकाला जाये बल्कि ऍफ़ आई आर भी दर्ज किया जाये और रिकवरी भी कराई जाये ,जिससे हमारे युवा में विश्वास पैदा हो कि गलत व्यक्ति या अयोग्य व्यक्ति नियुक्त नहीं हो सकता है। साथ ही जो भर्तियों कि एजेंसियां या आयोग है वो विश्वसनीय तरीके से काम करें ,पारदर्शिता बनी रहे। आयोगों में जो सदस्य या अध्यक्ष नामित हों उनकी योग्यता और ख्याति कि ठीक-ठाक ढंग से परिक्षण किया जाये,न कि ऐसे पद उपकृत करने के लिए दिया जाये ,क्यूंकि ये देश के भविष्य का सवाल है।
अंत में मेरा युवावों से यही अनुरोध है कि इन विषम परिस्थिति में सार्थक विचार को अपनाये ,अपना रोल मॉडल उनको बनायें जो कठिन परिस्थितयों में भी किस तरह आगे बढ़कर देश कि सर्वोच्च सेवा में या फिर अन्य फिल्ड में आयें । जब भी निराशा घेरे तो अपने से ज्यादा कष्ट वाले को देखिये। मैने चित्रकूट में देखा कि एक व्यक्ति के हाथ के दोनों पंजे नहीं थे फिर भी वह जीप अच्छे से चला रहा था। एक लड़की जिसका एक पैर घुटने से नहीं था फिर भी बेहतरीन डांस कर रही थी अभी देश के सर्वोच्च सेवा का परिणाम आया तो हम सभी ने देखा की किस तरह कठिन परिस्थितियों का सामना करके इसमे सफलता पाए ,ऐसे अनेकानेक उदहारण हैं उसे देख कर आगे बड़े और मंजिल को पाएं यही जीवन कि सार्थकता है अपने उद्देशय से कभी विचलित न हों ,यदि बड़े से बड़ा बाधा आये भी तो दूने जोश से उसका डटकर सामना करें ,सफलता आपका कदम चूमेगी।



आपके लेख में १००% सच्चाई है ��
जवाब देंहटाएंआपने बिल्कुल सच लिखा है सरकार ने बातें तो बड़ी बड़ी कर दी है पर हकीकत में ये सच हो पायेगी या नहीं ये देखने वाली बात है
जवाब देंहटाएंdhanyavaad
हटाएंVery true ��
जवाब देंहटाएंdhanyavaad
हटाएंAap sabke comment pr reply karte hai ye bahut achha lagta hai mujhe
जवाब देंहटाएंAise hi likhte rahiye God bless you
अतिउत्तम लेख
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