ये कहाँ आ गए हम - समझाविश बाबू

आदिम समाज  में पत्थर से चिंगारी उत्पन्न कर आग पैदा करते थे ,अब अदृश्य आग से काम  चलता है ,नग्न  घूमने की परम्परा से ऊपर आज लुंगी, धोती-कुर्ता से होते हुए जीन्स,टॉप और न जाने क्या -क्या पर  आ गए ,कंद,मूल आदि से होते हुए आज रोटी  से बढ़कर पिज़्ज़ा ,पास्ता  बर्गर और कौन-कौन से फ़ूड पर आ गए ये  हम  भी  नाम  नहीं  बता  सकते ,घास-फूस  के आशियाने से बढ़कर खपरैल,ईंट गारे के मकान से फ्लैट और बंगलो तक  आ गए। खुले आसमान को देखते -देखते एलईडी  टी वी  होम  थिएटर  तक  आ गए। प्रकृति के खुली  हवा  का  आनंद लेते-लेते ऐसी तक आ गए। पैदल  चलते-चलते  कार, हवाई  जहाज तक आ गए। संबंधों  में  भी  देखिये  अम्मा ,बाबूजी  से मम्मी हाय मॉम और हाय डैड पर आ गए। गांव  को परिवार की तरह  समझते-समझते संयुक्त परिवार  और फिर एकल परिवार तक आ गए। 

               सभी चीजों में बहुत प्रगति की है और करनी भी चाहिए , लेकिन  क्या जो मूल  तथ्य  है अपनत्व की भावना  उसे समाप्त करते जाना उचित होगा, गैस का प्रयोग करना बुरी बात नहीं है पर रोटी की मिठास गायब हो जाये ये ठीक नहीं है। हाय मॉम हाय  डैड बुलाना यदि सभ्यता का प्रतीक है तो बुरी बात नहीं है पर रिश्ता औपचारिक  बन जाये ये बुरी बात है। आप देखो हम कहाँ  खड़े  हैं एक समय था की तन को ढकने के लिए पत्तों का इस्तमाल करते थे आज  हम खुद जीन्स जगह-जगह फाड़ लेते है की आधुनिक डिज़ाइन है। पहले देखिये अर्थ और अपनत्व का बड़ियाँ सामंजस्य था पर आज अर्थ अपनत्व से काफी दूर निकल आया है अर्थ ही हावी हो गया है। अपनत्व और अर्थ में कितना फर्क है ये तब पता चलता है जब कभी हम बीमार पड़ते हैं और यदि हॉस्पिटल में एडमिट होना पड़े ,आप खूब पैसा डॉक्टर को दे दो इलाज अच्छे से करेगा पर यदि पास में कोई अपना न हो आप का दुःख बाटने वाला न हो तो वो दवा कितना असर  करती है जो उस दौर से गुजरता है उसी को पता लगता है।आप देखिये जब किसी के दाह संस्कार में शमसान जाना पड़ता है तो वहां पर कुछ छड़ के लिए हम इतने दार्शनिक बन जाते हैं की शंकराचार्य,रामानुज सब हमारे में समाहित हो जाते हैं। लगने लगता है किसके लिए झूठ-सच बोलकर धनार्जन में लगें हैं ,पर वहां से निकलते ही सब विस्मृत हो जाता है ,कार  चलना बुरी बात नहीं है कार के नीचे किसी  की भावनाओं को कुचलना बुरी बात है ,रिश्तों  की मजबूत गांठे किस तरह परत दर परत खुलती जा रही  हैं हमारे आँखों  की शर्म और हया किस तरह मरती जा रही है ये चंहु और दिख रहा है ,इसी  के कारण देखिये अपराध विशेष  तौर से महिलाओं  के प्रति कितनी तेजी से बढ़ रहे  हैं ,रिश्तों को तार-तार  कर देने  वाली घटनाये घटित  हो रही  हैं ,अकेलेपन  से अवसाद  की घटनाएं  भी  दिन-प्रतिदिन बढ़ रही  हैं और यही वजह है की युवा अवस्था में आत्महत्या की घटनाये भी बढ़ रही  है ,हमारे  रक्षा का दावा करने वाले  ही भक्षक बन रहें  हैं। जीवित पुत्र  के रहते  कितने  माता  पिता   वृद्धा-आश्रम में रहने को मजबूर हैं। कितने  माता-पिता  ऐसी  भी  हैं  जो साथ  रहकर  भी  अकेलेपन  का अहसास  कर रहें  हैं। 
       मेरा लिखने  का सिर्फ ये उद्देश्य है की अर्थ के पीछे-पीछे भागते-भागते इतना न आगे  भाग  जाएँ की रिश्ते पीछे छूट जाये और ऐसी जिंदगी न जीना पड़े की भूख और नींद  के लिए दवा का सहारा लेना पड़े। ऐसा जतन करीये की दुआ बनी रहे जिंदगी एक खुशनुमा सफर  के तरह  चलती रहे।रिश्तों में मधुरता बानी रहे अर्थ भले ही कम सही एकता बनी रहे ,जब आप पीछे मुड़ के देखें तो एक सच्चा चाहने वाला खड़ा रहे। क्यूंकि जब आप हँसे तो खोखलापन न हो।    


  

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