कच्चे धागे की पवित्रता - रक्षा बंधन स्पेशल - समझाविश बाबू

भारतीय धर्म-संस्कृति के मान्यता अनुसार रक्षा बंधन का त्यौहार श्रावण माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। पौराणिक मान्यता इस सम्बन्ध में इंद्रदेव ,राजा बलि ,कृष्ण और द्रौपदी एवम रानी कर्णवती और हुँमायुं के सम्बन्ध में मिल जाएंगे। जहाँ इस धागे की पवित्रता और रक्षा की सुदृढ़ता की परख स्वयं हो जाएगी। इसे केवल भाई-बहन का एक परंपरागत त्यौहार के रूप में ही नहीं लेना चाहिए,इसके मूल भावना को समझना चाहिए ,ये भाई द्वारा बहन को दिया गया एक ऐसा वचन है जो उसकी रक्षा का अमोघ अस्त्र है जिससे बहन को भी हरपल ये अहसास रहता है कि उसका भाई हर विषम परिस्थिति में उसके साथ खड़ा रहेगा। 

           आज कुछ परिस्थितियां बदलती जा रही है ,कई परिवार को मैं जनता हूँ जहाँ भाई-बहन को एक दूसरे से मिले १५-२० साल हो गए हैं ,राखी बंधवाना तो बहुत दूर कि बात है , एक दूसरे के सुख-दुःख में भी शामिल नहीं होते हैं। क्या राखी के पर्व की मूल भावना यही थी ?कितना भी कोई दोष या कटुता रही हो यदि दो कदम बढ़ाकर भाई बहन के यहाँ जाता और अपनी कलाई बहन के आगे रख देता ,तो बहन बिना राखी बांधे नहीं रह सकती। लेकिन दोनों अपने-अपने अहम् में जीते हैं और एक-दूसरे की खबर तीसरे के द्वारा प्राप्त करते हैं ,और वो तीसरा ये प्रयास वाला नहीं होता कि दोनों में मेल-मिलाप हो जाये वो भरसक दोनों को और दूर करने का प्रयास करता है ,क्यूंकि उसे दोनों जगह लाभ व सम्मान मिल रहा है। मेरा कहने का तात्पर्य यह है कि अगर स्वयं भाई-बहन आपस में पहल करें तो वो बेहतर है। एक दिन सभी को इस जहाँ से जाना है जाते समय ये मलाल लेकर जाना कि हम अपने रिश्तो को कायम नहीं रख पाए इससे क्या फायदा। जब हम एक अटूट रिश्ते को नहीं संभाल सकते तो बड़ी-बड़ी बातें करने का कोई हक़ नहीं है। राखी आप कितनी भी महंगी खरीद कर बांध दो ,कितने ही महंगे गिफ्ट लेलो लेकिन  यदि रिश्ता अटूट नहीं है ,रक्षा कि भावना नहीं है तो सब बेमानी है। आज राह चलते एक नारी के साथ जब अभद्रता कि जाती है बदतमीजी कि सारी हदें पार कर दी जाती है तब वहीँ पर कई पुरुष खड़े होकर तमाशा देखते हैं ,रक्षा का मूल मंत्र गायब हो जाता है ,वो नारी भी किसी कि बहन है ये कोई नहीं सोचता ,एक नया ट्रेंड चला है वीडियो बनाने का ,मात्र एक दो आदमी होते हैं बदतमीजी करने वाले  खड़े होकर तमाशा देखने वालों कि संख्या कहीं ज्यादा होती है ,फिर भी मात्र तमाशबीन बने रहना कहाँ उचित है। जबतक हम नारी के साथ हो रहे जुर्म का डटकर मुकाबला करने कि साहस नहीं कर सकते तब तक मात्र परंपरा निभाने के लिए राखी बंधवाना बेमतलब है। 
                      आज भी समय है सारे गिले-शिकवे दूर कर लो 
                      हो दूर तो आज इस अटूट बंधन को अपना लो 
                      जो नफरतों से पवित्र रिश्ते कि गांठो को खोला था 
                      आज पवित्र प्रेम से ऐसा जोड़ो वो बंधन 
                      अंतिम सांसो तक न टूटे ये पवित्र अटूट बंधन।। 



टिप्पणियाँ

  1. Raksha bandhan ki aapko bahut shubhkamnaayein �� Aapne 100% such likha hai

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  2. Aaj hum sub rishton ki ahmiyat khote ja rahe hai aise mein aapka laikh humein bahut kuch sikhata hai
    Very nice

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  3. सच मे रिश्ते बदल गए है पर उसके जिम्मेदार हम ही है हम अपने बच्चों के सपनो को दबाते है उनपे अपनी जिद अपनी इच्छायें डालते है फिर चाहे वो हमारा बेटा हो या कोई पराया वो दिल से दूर होता ही जायेगा।

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    1. लेकिन आज कल जो बच्चे माँ बाप को भूलते जा रहे हैं उनके लिए आप कया कहेगीं माँ बाप के इतना करने पर भी वे उनका महत्व नहीं समझते
      ऐसे बच्चों के लिए आप कया कहेगीं जो अपने माँ बाप की इज्जत तक नहीं करते

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  4. अगर हम रिश्तों में दबाव न डाले सामने वाले पे अपनी इच्छायें न थोपें उसको हमेशा सपॉर्ट करें , आज कल सब समझदार है बस उनकी मानसिक स्थिति हमारे व्यवहार पे है अगर मानसिक दबाव बनाएंगे हम तो आत्महत्या या हमसे दूर जाने के अंजाम होते है।
    खुशी खुशी साथ रहे हर रिश्तों में पूरे सपोर्ट के साथ आप पाएंगे समय कोई भी हो हमसे कोई मन से दूर नही होगा।

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    1. आपकी बात सही है पर हमेशा सलाह देना इच्छा थोपना नहीं होता आपने जो आत्महत्या शब्द का प्रयोग किया है वह तो एक प्रकार से इमोशनल बलैकमेल करना है परिवार कभी अपनों का बुरा नहीं चाहता कनक जी

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